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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

शुक्रसारं विदुर्जीवं प्रालेयकणसंनिभम् । आनन्दोऽचलसंदोहस्तत एव प्रवर्तते ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह उयाधिरूप मन की कारणता का निस कर अब उपहितजीव के प्रति कारणता का निरास करने के लिए उपाधि का स्वरूप बतलाते हैं / सबसे पहले हिमकण के सदृश तथा शुक्र (वीर्य) रूप उपाधि से युक्त जीव होता है, यह मुनियों का मत है। इस शुक्रोपहित जीव से ही माता-पिता के मैथुन काल में अचल पूर्णनन्द ब्रह्म का भोगाकार वृत्ति में प्रतिबिम्ब पड़ने से रतिरूप आनन्द प्रवृत्त होता है, इसी आनन्द की एक मात्रा को लेकर दूसरे प्राणी अपने-अपने आनन्द का निर्वाह करते हैं । इस अर्थ की प्रतिपादक श्रुति भी इस विषय में प्रमाण है