Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
आसरीसृपमारुद्रमेवमभ्युदितो भ्रमः ।
अणावप्यद्रिविस्तारो बीजकोश इव द्रुमः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, तुच्छ से तुच्छ कीटादि तक और बड़े से बड़े रुद्र तक इस तरह का जगत्-रूपी
भ्रम जो उत्पन्न हुआ है, वही यह सृष्टि है । जैसे छोटे से बीज में बड़ा वृक्ष उत्पन्न होता है,
वैसे ही छोटे से छोटे अणुरूप आत्मा में यह विशाल पर्वतरूप भ्रम उत्पन्न हुआ है