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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

यथैष स विराडेव विराट् प्रत्येकमात्मनि । स्वसंविदि प्रसरति बोधवान्न त्वबोधवान् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे विराट्‌ पुरुष (समष्टिजीव) समस्त जगत्‌ का निर्माण करता है, वैसा ही व्यष्टिजीव भी अपने में समस्त जगत्‌ का निर्माण करता है क्योकि मानसिक वृत्ति के अनुसार जब व्यष्टि जीव को बाह्याकार विज्ञान उत्पन्न होता है, तब व्यष्टिजीव भी समष्टिजीव के अनुसार तत्‌-तत्‌ पदार्थों के स्वरूपज्ञान से युक्त रहता ही है