Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
संकल्पपुरुषस्त्वेष यद्यत्कल्पयति स्वयम् ।
तत्तथा तादृशं पञ्चभूतात्मा भवतीव खम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
(७) ब्रह्मा आदि के शरीर भी चन्द्ररूपी अमृत के परिणाम ही हैं । देखिये इस विषय में श्रुति
क्या कह रही है - सोमः पवते जनिता मतीनां जनिता दिवो जनिता पृथिव्याः । जनिताग्नेर्जनिता
सूर्यस्य जनितेन्द्रस्य जनितोत विष्णोः ॥
बीसवाँ सर्ग
वासना, कर्म और इच्छा के अनुसार संकल्पां के सर्जन से व्यष्टिजीवों की समष्टि के साथ समता का वर्णन ।
व्रह्म विराट् पुरुष के सत्यसकल्य के अनुसार ही विवर्त धारण करता है, यह कहते हैं /
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, पंचभूतात्मा विराट् पुरुष स्वयं जिस-जिस तरह की
कल्पना करता है, उस-उस तरह से ब्रह्मरूप आकाश भी विवर्तभाव को धारण कर लेता
है
सर्ग सन्दर्भ
उन्नीसर्वोँ सर्ग समाप्त (८) इसमें “चन्द्रमा मनसो भूत्वा हृदयं प्राविशत्" यह श्रुति प्रमाण है ।