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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, Verse 13

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 20, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 20 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

प्रतियोगिव्यवच्छित्तेरभावात्स्वस्वभावयोः । स्वभावोक्तिर्न चैवात्र भवत्यर्थानुसारिणी ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि उपाधियुक्त स्वरूप में कड भी कारण नहीं है, तो वह जीवों का अनायन्दुक स्वरूप स्वभावरूप ही माना जायेगा, स्वभाव तो किसी का चला जाता नहीं: ऐसी स्थिति में जीवों की मुक्ति ही नहीं होगी, इस प्रकार की आशंका कर कहते हैं / आप जो इस औपाधिक रूप के विषय में कहते हैं कि वह अनागन्तुक जीव का स्वभाव ही है, वह आपका कथन किसी अर्थ से पूर्ण नहीं है यानी वह कोई मूल्य ही नहीं रखता, क्योकि स्व ओर स्वभाव में कोई प्रतियोगी और व्यवच्छेद है ही नहीं । सारांश यह है कि स्वशब्दार्थ से युक्त जो भाव है, यही तो स्वभावशब्द का अर्थ है, यहाँ स्वशब्द का अर्थ यदि शुद्ध आत्मा मान लिया जाय, तो शुद्ध वस्तु अद्वितीय है, अतः न तो वह प्रतियोगी है और न उसका कोई व्यवच्छेद ही है, इसलिए अव्यावर्तक (किसी से भिन्नता न करनेवाले) स्वशब्दार्थ से भिन्न भावशब्दार्थ का निरूपण न हो सकने के कारण स्वशब्दार्थविशिष्ट भावशब्दार्थ का (स्वभावार्थ का) साधन करना ही नहीं बन सकता