Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 162
एक सौ साठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ इकसठवाँ सर्ग जगद्रूप चित्र का ब्रह्म से अतिरिक्त दूसरा कारण नहीं है यह चिन्मात्रप्रतिभारूप है।
18 verse-groups
- Verse 1अज्ञानवश ही इसका भान होता है, ज्ञान होनेपर यह ब्रह्म ही है, यह वर्णन । श्रीरामचन्द्रजी ने…
- Verses 2–4उसमें कोई अन्य निमित्त हो अथवा न हो, अज्ञात आत्मा में मोक्ष होने तक इस प्रकार की भ्रान्ति…
- Verses 5–6उन अनन्त पदाथाकार प्रतिभासो में अधिष्ठानभूत सन्मात्ररूप ब्रह्म शाखाप्रशाखाओं में वृक्ष की…
- Verse 7निज आत्मा में स्वप्ननगर के समान यह चितिचमत्कार केवल भान ही है उसमें सारभूत है या निस्सार…
- Verse 8इसका जव यथार्थरूप में परिज्ञान हो जाता है तब यह केवल चिदाकाश मात्र हे । जब आप सरीखे अज्ञा…
- Verses 9–14हे तत्त्वज्ञ लोगों, संसार चिदाकाश का विकासमात्र है, अत: सर्वतः (सब प्रकार से) सत्य शिव सु…
- Verse 15यह सव ध्यान लगानेवाले विज्ञ पुरुषों के अनुभव से सिद्ध है, ऐसा कहते हैं। निर्विकल्प समाधि…
- Verses 16–17इससे ब्रह्म का अज्ञानी पुरुष के चित्तरूप उपाधि मे जगत् के रूप में भान होता है अन्यत्र चि…
- Verse 18ब्रह्मभावापन्न जगत् का तो विनाश नहीं होता, ऐसा कहते है। जो यह कुछ दिखाई देता है वह निर्द…
- Verses 19–25अज्ञानदशा में भी जगत् स्वप्नवत् चित् का विवर्तमात्र ही है, ऐसा कहते हैं। अपने स्वच्छ स…
- Verse 26जब स्वप्न ओर जाग्रत दोनों समान ही हैं तब लोगों का उनमें असाम्य प्रत्यय क्यो होता है ? इस…
- Verse 27जाग्रत् बाहर में रहता है और स्वप्न अन्दर रहता हे यह अन्तर भी दोनों मे नहीं है, क्योकि स्…
- Verses 28–32जो ही जाग्रत् है वही स्वप्न है ओर जो स्वप्न है वही जाग्रत है, क्यो कि दोनों में कालान्तर…
- Verses 33–38जाग्रत् में स्वप्न-समानता का प्रतिपादन करने का मतलब दिखलाते हैं। इस प्रकार जैसे विशालतम…
- Verse 39यदि ऐसा है तो नित्यमुक्त आत्मा में बन्धनभ्रान्ति ही नहीं करनी चाहिये, ऐसा कहते हैँ । इसलि…
- Verses 40–43स्वप्न के भेद की प्रतीति की कल्पना को भी उन दोनों के साक्षीरूप ही आप जानिये न कि चिद्भेद,…
- Verse 44एक सद् वस्तु का ही सकल द्रैतरूप से (सर्गरूप से) जब प्रतिभास है तब ब्रह्म ही द्वैत-अद्वैत…
- Verses 45–46तो क्या ब्रह्म को द्वैत-अद्वैतसमुच्चयरूप ही समझना चाहिये ? इस प्रश्नपर नकारात्मक उत्तर दे…