Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, Verse 39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, verse 39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 162 · श्लोक 39
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
यदि ऐसा है तो नित्यमुक्त आत्मा में बन्धनभ्रान्ति ही नहीं करनी चाहिये, ऐसा कहते हैँ ।
इसलिए इस प्रकार अबन्ध (बन्धन अयोग्य) चिन्मय का यह बन्धन ही न कीजिये । निर्मल आकाश
ओर निराकार चिन्मय में कौन-सा अन्तर है जिससे आकाश नहीं बोधा जा सकता लेकिन चिदात्मा
बाँधा जा सकता है ऐसा कहा जा सके । क्योकि अमूर्तता, अलेपकता, सूक्ष्मता आदि से दोनों में
अत्यन्त समता हे । इस दृश्य नामधारी अविद्यासंज्ञक चिन्मय आकाश का स्फुरण होनेपर निराकार
चिन्मयका बन्ध अथवा मोक्ष कहाँ ओर किससे होगा ? जब अविद्या नहीं है तब किसी का बन्धन बन्धन
नहीं है ओर किरी का मोक्ष भी मोक्ष नहीं हे । क्योकि ब्रह्म से अतिरिक्त 'है “नहीं हे" यों व्यवहार के
योग्य वस्तु ही अत्यन्त दुर्लभ हे । विद्या अथवा अविद्या का अस्तित्व हे ही नहीं । यह आकाशआकृति की
चिति ही स्वप्न की तरह सर्गाकार स्वदेहवाली होकर स्फुरित होती है ॥३ ५-३ ८॥ एक प्रदेश से दूसरे
प्रदेश की प्राप्ति होनेपर मध्य में निर्विषय जो संवित् का स्वरूप प्रसिद्ध है वही स्वप्न ओर जाग्रत् में
प्रसिद्ध दृश्य का परमार्थिक रूप है, ऐसा ही निश्चय करना चाहिये