Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, Verse 26
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, verse 26 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 162 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
शाम्यत्यशान्तमेवेदं स्थितमेव विलीयते ।
दृश्यं तत्त्वपरिज्ञानाद्दृश्यमानं न दृश्यते ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
जब स्वप्न ओर जाग्रत दोनों समान ही हैं तब लोगों का उनमें असाम्य प्रत्यय क्यो होता है ?
इस प्रश्नपर काल की अल्पता ओर अधिकता से उनमें असाम्यप्रतीति होती है, अनुभव से नहीं
होती, ऐसा कहते है ।
यहाँ स्वप्न ओर जाग्रत् ऐसी बुद्धि क्रमशः स्वल्प समय ओर दीर्घं समय तक होती है उन दोनों में
वर्तमान अनुभव में साम्य है, अतः दोनों तुल्य हैं