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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, Verses 2–4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, verses 2–4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 162 · श्लोक 2-4

संस्कृत श्लोक

स्वप्नचित्पुररूपत्वादन्यद्यस्मान्न विद्यते । जगत्तस्मान्नभः शान्तं नेह नानास्ति किंचन ॥ २ ॥ चिदाभानमनानैव नानेव परिलक्ष्यते । अनात्मैवात्मनात्मानं स्वप्नाकाशपुरेष्विव ॥ ३ ॥ सर्गादाविव चिद्व्योम स्वप्नाकाशपुरं जगत् । आभातमेवासत्यं च नूनं सत्यमिव स्थितम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

उसमें कोई अन्य निमित्त हो अथवा न हो, अज्ञात आत्मा में मोक्ष होने तक इस प्रकार की भ्रान्तियाँ सदा ही होती रहती हैं, ऐसा श्रीवसिष्ठजी उत्तर देते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे वत्स, स्वात्मरूप परमात्ममहासागर में इस प्रकार के शून्यात्मक प्रतिभाआवर्त (भ्रान्तियाँ) अपने आप निरन्तर होते रहते हैँ । जैसे पंखा आदि अन्य निमित्त रहे चाहे न रहे स्पन्दात्मक वायु से निरन्तर सूक्ष्मातिसूक्ष्म स्पन्दलेश सदा ही निकलते रहते हैं वैसे ही सच्चित्परमात्मा से पदार्थाकार प्रथा चिदाकाश में निरन्तर उदित होती ही हे । सच्चित्‌ परमात्मा से अपनी अवयवभूत जो पदार्थाकारप्रथारूपी प्रभा जैसी उदित होती है वह यहाँ तब तक ज्यों कि त्यों वैसी ही रहती है जबतक कि वह अन्य आकारान्तर प्रतिभा से नष्ट नहीं की जाती जैसे कि मिट्टी का पिण्डादि आकार घटादि अन्य आकार में परिणति द्वारा नष्ट किया जाता हे