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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, Verses 40–43

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, verses 40–43 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 162 · श्लोक 40-43

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

स्वप्न के भेद की प्रतीति की कल्पना को भी उन दोनों के साक्षीरूप ही आप जानिये न कि चिद्भेद, क्योंकि तीनों अवस्थाओं में अनुगत साक्षिभूत चिति का अन्त दूसरे किसने देखा है जो कि चित्‌ में भेद देखेगा ? चिदाकाश ही अभेदबुद्धि है ओर चिदाकाश ही भेदबुद्धि है ऐसा होनेपर द्वैत ओर द्वैत दोनों ही अखण्ड शान्त एक ही हँ । जैसे ब्रह्म के सत्‌, चित्‌ ओर आनन्द रूप अंशो मेँ सत्‌ अंश बोधमय ओर बोध से (ज्ञान से) ग्राह्ममय-दोनों में अभिन्न हे वैसे ही द्रैत और द्वैतज्ञान दोनों एक ही हैं, इसलिए चिदंश भी अभिन्न है क्योंकि जो ही दृष्ट हैं यानी दृष्टियों के विषयीकृत हैं वे ही "दृश्य" कहे जाते है । कोई भी चितूतादात्म्य से अतिरिक्त विषयविषयिभाव का निरूपण नहीं कर सकता