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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, Verse 27

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 162 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

स्फुटानुभवनस्यापि स्वप्नकाले निजे यथा । परिज्ञानादसत्यत्वमेव सत्यपदं गता ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

जाग्रत्‌ बाहर में रहता है और स्वप्न अन्दर रहता हे यह अन्तर भी दोनों मे नहीं है, क्योकि स्वप्न भी बाहर में रहता हे । अतः स्वप्न जाग्रत के तुल्य ही है। सब वस्तुओं में स्वप्न ओर जाग्रत काल में पूर्णरूप से गुणसाम्य का अनुभव होता है, अतः स्वप्न ओर जाग्रत में जुड़वें भाइयों के समान कोई भी बड़ा नहीं है