Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, Verses 45–46
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 162, verses 45–46 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 162 · श्लोक 45,46
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
तो क्या ब्रह्म को द्वैत-अद्वैतसमुच्चयरूप ही समझना चाहिये ? इस प्रश्नपर नकारात्मक उत्तर
देते हैं ।
पहले सर्गरूपी ही परम ब्रह्म द्वैत और अद्वैत है यों मूर्तअमूर्त प्रपंच की ब्रह्मरूपता का निर्णय कर
पीछे “नेति नेति श्रुतिवाक्य से सकल द्वैत के निषेध द्वारा चारों ओर से सकल द्वैत का त्याग कर चौगिर्द
से आविर्भूत इस प्रत्यगात्मरूप चिदाकाश मेँ उत्तरोत्तर भूमिका के अभ्यास से सेन्धव घन के समान
आनन्दैकरसघन शिला बनकर आप स्थित होइये | हे सुभग, इस प्रकार सुचिन्मय ब्रह्म में परमपदरूप
शिला बने हुए निश्चिन्त निष्क्रिय हुए आप क्रमश: अपने वर्ण और आश्रम के धर्मो का उल्लंघन किये
बिना और लोकमर्यादा का उल्लंघन किये बिना अपने वित्तानुसार अभीष्ट देश में जाइये, पीजिये,
खाइये और अपने इष्टमित्रों को खिलाइये