Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 14
तेरहवाँ सर्ग समाप्त चौदहवाँ सर्ग उस कुल में उत्पन्न इन्द्र की बिस तन्तु मँ जगत् की रचना तथा सब तरह के विचारकर देखने पर ब्रह्दृष्टि आकाश की इन्द्रता का वर्णन।
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- Verse 1भुशुण्डजी ने कहा : हे विद्याधर, पूर्वोक्त उस इन्द्र के कुल में उत्तम गुणों से पूर्ण श्रीस…
- Verse 2कुछ दिनों के बाद उस देवलोक में इन्द्र के वंश में उत्पन्न हुए लड़के को बृहस्पति की उपदेशवा…
- Verse 3तदनन्तर वेद्यवस्तु का ज्ञान प्राप्त करानेवाले तथा प्रारब्धानुसार प्राप्त कार्यो का सम्पाद…
- Verses 4–5उसने दानवं के साथ युद्ध किया, अपने शत्रुओं को जीता तथा अज्ञान को पार कर चुके मनवाले उस रा…
- Verse 6उसने अपने किसी कार्यवश कमलदण्ड के कोमलतन्तु के अन्दर चिरकाल तक निवास किया। उस बिसतन्तु के…
- Verses 7–9इसके बाद उसने एकान्त में स्थित होकर बाहर और भीतर के सम्पूर्ण विक्षेप कारणों के त्याग से श…
- Verse 10वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के गुणों से निर्मुक्त होता हुआ भी उनके रूप आदि गुणों के ग्रहण करने…
- Verse 11समस्त प्राणियों के बाहर-भीतर स्थित अचर तथा चर, सूक्ष्म होने से अविज्ञेय एवं दूरस्थ होने प…
- Verses 12–14सर्वत्र चन्द्र-सूर्यमय, सर्वत्र पृथिवीमय, सर्वत्र पर्वतमय, सर्वत्र सागरमय, सर्वत्र चित्सा…
- Verses 15–16घट, पट, वट, शकट, दीवार, वानर, तेज, गृह, आकाश, वृक्ष, पर्वत, वायु, जल और अग्नि आदि सब पदार…
- Verse 17मिर्च के भीतर तीक्ष्णता तथा आकाश के भीतर शून्यता की नाई तीनों जगत् सदसद्रूप (आविर्भावकाल…
- Verse 18ज्ञान से देखता हुआ वह इन्द्र पूर्ववासना कल्पित उसी शरीर से क्रमश: वैसे ही ध्यानवान् हो ग…
- Verse 19महामति उदारबुद्धि उस इन्द्र ने ध्यान लगाकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को मायाशबलितब्रह्य में देर…
- Verse 20तदनन्तर हम लोगों के इस ब्रह्माण्ड में पाताल, भूमि आदि लोकँ के क्रम से इन्द्र-लोक के भीतर…
- Verse 21हे विद्याधर कुलाधीश, इस रीति से उस त्रसरेणु के अन्तर्गत इन्द्र के कुल में उत्पन्न वह इस ब…
- Verse 22इस ब्रह्माण्ड का इन्द्र बन जाने के बाद, उसने हृदय में बीज के सदुश संस्काररूप से स्थित पूर…
- Verses 23–24सर्वशक्ति सम्पन्न ब्रह्म में सर्वत्र सवका सद्भाव होने से इस तरह के सैकड़ों इन्द्र विद्यमा…
- Verses 25–26हे विद्याधर, जब तक आत्मसाक्षात्कार नहीं होता, तब तक प्रबल यह दृश्यरूप नदी अविच्छिन्नरूप स…
- Verse 27वकि यह माया हैं, इससे इसके वेवित्रय में कोई विशेष हेतु ढूँढ़ने की जरूरत नहीं है, यह कहते…
- Verse 28अथवा एकमात्र अहंकाराध्यास ही इसके वैचित्रय में निश्चित हेतु है, यह कहते हैं। मेघ से वृष्ट…
- Verse 29चूँकि सर्वसाक्षिब्रह्म का रूप परमार्थतः समस्त विकल्पों से रहित ही है, इसीलिए अहंकार के वश…