Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 14, Verse 28
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 14, verse 28 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
अहंभावचमत्कारमात्रादृष्टरिवाम्बुदात् ।
जायते मिहिकेवाशु प्रेक्षामात्रविनाशिनी ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा एकमात्र अहंकाराध्यास ही इसके वैचित्रय में निश्चित हेतु है, यह कहते हैं।
मेघ से वृष्टि के सदृश अहंभावरूप चमत्कार से कुहरे के जैसी यह माया उत्पन्न होती है और
आत्मा के साक्षात्कार मात्र से क्षण भर में ही शीघ्र नष्ट हो जाती है