Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 14, Verses 23–24
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 14, verses 23–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 23,24
संस्कृत श्लोक
यथैष शक्रः कथितस्त्रसरेणूदरास्पदः ।
बिसबालास्पदश्चैतत्कुलजः कान्तिमानथ ॥ २३ ॥
तथा शतसहस्राणि तत्रेतश्चान्यतश्च खे ।
तादृशव्यवहाराणि समतीतानि सन्ति च ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
सर्वशक्ति सम्पन्न ब्रह्म में सर्वत्र सवका सद्भाव होने से इस तरह के सैकड़ों इन्द्र विद्यमान है
यह कहते हैं /
त्रसरेणु के उदर में बिसतन्तु के भीतर अपना निवास बनाकर कान्तिमान् जैसे यह इन्द्र कहा
गया है, वैसे ही इधर-उधर उस तरह के सैकड़ों हजारों व्यवहार चिदाकाश में हो चुके हैं और हो
भी रहे हे