Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 14, Verses 15–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 14, verses 15–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 15, 16
संस्कृत श्लोक
घटे पटे वटे कुड्ये शकटे वानरे तथा ।
धाम्नि व्योम्नि तरावद्रावनिले सलिलेऽनले ॥ १५ ॥
नानाचारविचाराणि विविधावृत्तिमन्ति च ।
परमाण्वंशमात्रेऽपि त्रिजगन्ति ददर्श सः ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
घट, पट, वट, शकट,
दीवार, वानर, तेज, गृह, आकाश, वृक्ष, पर्वत, वायु, जल और अग्नि आदि सब पदार्थो में तथा परमाणु
के एक अंशमात्र में भी नानाप्रकार के प्राणियों के शारीरिक आचारं तथा मानसिक विचारों से युक्त
एवं स्वर्ग, नरक आदि के गमनागमनादि से समन्वित उसने तीनों जगत् को देखा