Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 14, Verse 27
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 14, verse 27 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
यतः कुतश्चिन्मायेयं यत्र क्वचन वानघ ।
यथाकथचित्संपन्नमात्रैव परिदृश्यते ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
वकि यह माया हैं, इससे इसके वेवित्रय में कोई विशेष हेतु ढूँढ़ने की जरूरत नहीं है, यह कहते हैं।
हे अनघ, यह माया जिस किसी कारण से जहाँ कहीं यथा कथंचित् उत्पन्न हुई दिखाई देती है,
अतः इसकी विचित्रताओं के विषय में विशेष चिन्ता नहीं करना चाहिए