Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 14, Verses 12–14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 14, verses 12–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 12-14
संस्कृत श्लोक
सर्वत्र चन्द्रार्कमयं सर्वत्रैव धरामयम् ।
सर्वत्र पर्वतमयं सर्वत्राब्धिमयं तथा ॥ १२ ॥
सर्वत्र सारगुरुकं सर्वत्रैव नभोमयम् ।
सर्वत्र संसृतिमयं सर्वत्रैव जगन्मयम् ॥ १३ ॥
सर्वत्रैव च मोक्षात्म सर्वत्रैवाद्यचिन्मयम् ।
सर्वत्र सर्वार्थमयं सर्वतः सर्ववर्जितम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
सर्वत्र चन्द्र-सूर्यमय, सर्वत्र पृथिवीमय, सर्वत्र पर्वतमय, सर्वत्र सागरमय, सर्वत्र
चित्सार, गुरुरूप, सर्वत्र आकाशमय, सर्वत्र संसृतिमय, सर्वत्र जगन्मय, सर्वत्र मोक्षरूप, सर्वत्र
आद्यचिन्मय, सर्वत्र सर्वपदार्थमय तथा सर्वत्र वह सबसे रहित था