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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 14, Verse 10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 14, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 14 · श्लोक 10

संस्कृत श्लोक

सर्वेन्द्रियगुणैर्मुक्तं सर्वेन्द्रियगुणान्वितम् । असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के गुणों से निर्मुक्त होता हुआ भी उनके रूप आदि गुणों के ग्रहण करने की शक्तियों से समन्वित था । परमार्थ में सबसे अलग रहता हुआ भी वह व्यवहार में सबको धारण किये हुए था । निर्गुण रहने पर भी वह सम्पूर्णं गुणों का भोक्ता था