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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 126

31 verse-groups

  1. Verses 1–7एक सौ चौबीसवाँ सर्गं समाप्त एक सौ पचीसवाँ सर्ग इस विपत्ति में विपश्चितो का आपस मेँ एक दूस…
  2. Verse 8योगिर्यो की दृष्टि से सारा प्रपंच मनोमात्र है ओर मानस कर्मो में मन का सर्वत्र एक साथ व्यव…
  3. Verses 9–15चिन्मात्र ही वस्तु, इस मुख्य पक्ष में सर्वेश्वर की ही सर्वत्र सवार्थिक्रियोपपत्ति है, ऐसा…
  4. Verses 16–18मायाशवल ही जगदात्मक है, वही द्रष्टा और दृश्य के रूप से जगद्रूप मेँ उदित हआ है । जो वस्तु…
  5. Verse 19बोध ओर अबोधरूप शबल परमात्मा में क्या असाध्य है | परमबोध को प्राप्त न हुई संवित्‌ की पदार्…
  6. Verse 20योगियों को ऐच्छिक अर्थक्रियासामर्थ्यरूप सिद्धि होने पर भी उपपत्ति कहते हैं। किंचित्‌ बोध…
  7. Verse 21प्रबुद्ध लोगों के प्रति सव वस्तुएँ मनोमात्र ही हैं, इस पक्ष में तो सब जगह सवर्थि-क्रिया म…
  8. Verse 22विपश्चतों के प्रसंग में योगियों और ज्ञानियों की एक साथ सवर्थीक्रियोपपत्ति का वर्णन होने प…
  9. Verses 23–26श्रीरामजी, आपने मुझसे पूछा कि योगी व्याप्त होकर कैसे विविध काम करते हैं ? मैंने यहाँपर प्…
  10. Verses 27–28हे महाबाहो, वे विपश्चित्‌ अत्यन्त प्रबुद्ध न थे, वे बोध ओर अबोध के बीच में दोलायमान-से स्…
  11. Verses 29–32हे श्रीरामचन्द्रजी, और भी सुनिये, जीवन्मुक्तशरीरवाले ज्ञानयोगियों को व्युत्थानकाल में ही…
  12. Verses 33–34इसी कारण उन्हें अन्य लोग ये जीवन्मुक्त है यों नहीं पहिचान पाते हैं, किन्तु धारणा से सिद्ध…
  13. Verse 35यदि बन्ध और मोक्ष मन के धर्म हैं, तो आत्मा बद्ध है आत्मा मुक्त हआ” यों शास्त्र में कैसे व…
  14. Verse 36जैसे शरीर संयोगी मन में शरीर के धर्मो की प्राप्ति होती है वैसे ही मनोधर्म मोक्ष की भी शरी…
  15. Verses 37–39यदि किसीको शंका हो कि कोटा चुभने से पैर में मुझे कष्ट है ओर देह में मेरे चन्दनलेप प्रयुक्…
  16. Verses 40–43तत्त्वदर्शी लोग वीतराग होने पर भी अनुरक्त जैसे, कोपविहीन होने पर भी कोपयुक्त जैसे तथा मोह…
  17. Verses 44–45ऊँचे स्वर से सामगायन में तत्पर ब्रह्माजी के शिर को भगवान्‌ शंकर ने अपने नख से कोमल कमल के…
  18. Verses 46–47तो उनका वार मुखो से वेदोपदेश करने का क्या प्रयोजन है ? इस प्रश्न पर कहते है । न तो उनका य…
  19. Verse 48उत्तम आशयवाले ये भगवान्‌ शंकरजी समर्थ होते हुए भी रागिता का त्याग नहीं करते हैँ, कामदहन क…
  20. Verse 49न तो उनका कर्म से कोई प्रयोजन है ओर न अकर्म से ही कोई प्रयोजन हे । उनका सकल भूतो मे कोई भ…
  21. Verses 50–53उनकी यह रागिता ही रहे अथवा यह रागिता मत रहे। अरागिता से उनका कौन लाभ है या कोन क्षति हे ।…
  22. Verse 54इच्छाविहीन सूर्य आदि भी प्राणियों के कमानुसार ही अपने-अपने अधिकार का पालन करते है, ऐसा कह…
  23. Verses 55–62दिननायक सूर्य अपने शरीर को रोकने के लिए समर्थ नहीं हैं सो बात नहीं है। फिर भी निष्काम जीव…
  24. Verse 63इससे जीवन्मुक्त लोगों में राग, द्वेष आदि के आभास का दर्शन होने पर भी मुक्ति के संदेह का ख…
  25. Verse 64भ ब्रह्म नहीं हूँ" ऐसी भेदबुद्धि रहने पर ही मुक्ति में संशय होगा, वही उनको नहीं है, ऐसा क…
  26. Verse 65तत्त्वसाक्षात्कार से जीवजगत भेद कैसे बाधित होता है, ऐसी यदि किसी को आशंका हो तो वह केवल भ…
  27. Verse 66जैसे निस्स्वरूप इन्द्रधनुष में भाँति-भाँति के रंग प्रतीत होते हैं वैसे ही आकाशरूपी आँगन म…
  28. Verses 67–68आकाश में शून्यत्व की तरह प्रकटता को प्राप्त हुआ, न कभी उत्पन्न हुआ और न कभी नष्ट हुआ यह अ…
  29. Verses 69–70जगत्‌भाव के समान जगत्‌ के जन्मनिरोधभाव की भी ब्रह्म में कल्पना से ही उपपत्ति है, ऐसा यदि…
  30. Verses 71–73असमाधिकाल मे भी शाखाचन्द्रदर्शन में बुद्धिवृक्ति के शाखाप्रदेश से चन्द्रवेशप्राप्ति में ब…
  31. Verse 74हे आकाश के कोष के सदृश निर्मल आशयवाले श्रीरामचन्द्रजी, जो सम्पूर्ण दुश्यसमूह शिलाघनरूप शा…