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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verses 37–39

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, verses 37–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 37-39

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

यदि किसीको शंका हो कि कोटा चुभने से पैर में मुझे कष्ट है ओर देह में मेरे चन्दनलेप प्रयुक्त सुख है, यों लोग मन के धर्म सुखदुःख आदि का देह में ग्रहण करते है । इसलिए मनोधर्मो का आत्मा में ही अध्यास कैसे ? तो इस पर कहते हैं। अवच्छेदकता सम्बन्ध से देह में सुख-दुःख आदि का अनुभव कर रहे मनुष्य को “अहं सुखी अहं दुःखी" यों आत्मा में ही उसका पर्यवसान है, अतः आत्मा में ही यह सुख-दुःख आदि की कल्पना है, बाह्य देह आदि में नहीं है । इसीलिए आत्मा में अध्यास का अंगीकार न करनेवाले देहादि में आत्मा का अभिमान करने से रूपान्तर को प्राप्त हुए चार्वाक, नैयायिक, सांख्य, बोद्ध, कणाद आदि पण्डित मोक्ष के उपाय की प्राप्ति न होने से पराभूत दिखाई देते हैं अथवा जल्पकथा (शास्त्रार्थ) में वेदान्तियों द्वारा पराजित दिखाई देते हे । सुखदुःख आदि रूप बन्ध का भले ही देह मेँ भी कदाचित्‌ अनुभव हो, किन्तु मोक्ष का तो देह में कदापि अनुभव नहीं होता। जीवन्मुक्त पुरुषों को समाधि में ओर देहमाव अवस्था में इस बात का स्पष्ट अनुभव तथा मन्द और मध्यम ज्ञानियों को भी व्युत्थान काल में देहान होने पर उसका अनुभव होता है, इस आशय से कहते है । जीवन्मुक्त पुरुषों के देह आदि नित्य अशरीर आत्मस्वभाव से कदापि पृथक्‌ नहीं है, जीवन्मुक्त महोदय मरकर भी नहीं मरता, रोता हुआ भी नहीं रोता ओर हँसता हुआ भी नहीं हँसता है । भगवती श्रुति भी है - (अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम्‌ । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति॥ “इसलिए वह मरणादि धर्मो से युक्त नहीं होता है । मानस धर्मो से भी उनका सम्बन्ध नहीं है, यह कहते है