Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verses 71–73
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, verses 71–73 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 71-73
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
असमाधिकाल मे भी शाखाचन्द्रदर्शन में बुद्धिवृक्ति के शाखाप्रदेश से चन्द्रवेशप्राप्ति में बीच में जो
निर्विषय वृत्तिअभिव्यक्त संवित् का स्वरूप है तन्मय जगत् को जानना चाहिये, ऐसा कहते हैं।
एक प्रदेश से अन्य प्रदेश की प्राप्ति होने पर मध्य में निर्विषय चिदाकाशरूप जो संवित् का स्वरूप
है तन्मय जगत् को जानना चाहिये । उक्त प्रकार के चिदात्मा में जो विशेषरूप द्वैत ओर सामान्यरूप
एेक्य प्रतीत होता है वह भी उक्त चिदाकाशस्वभाव से ही हे ही नहीं ऐसा मैं मनन से निश्चय करता हूँ।
(७) मेघघटा में स्थित सूर्यकिरण ही इन्द्रधनुष के रूप में दृष्टिगोचर होती है, यह प्रसिद्ध है ।
वह केवल शून्य है ऐसी जो प्रतीति होती है वह भी है ही नहीं, क्योकि उस पूर्णानन्दैकरस में शून्यता का
भी सम्बन्ध नहीं हे । शून्यता ओर पूर्णता जैसी सप्रतियोगिक लोक में प्रसिद्धि हे, जैसे कि जल से शून्य
घडा या जल से पूर्ण घडा, उसका आत्मा में सम्भव नहीं है, किन्तु यह जगत् जगत्भाव के अन्यत्र
अप्रसिद्ध होने से, आकाशरूप ही है । इस प्रकार आत्मा ही आत्मा में स्थित है, यों अन्यनिरपेक्ष पूर्णता
है । जैसे भावी नगर वर्तमान काल में प्रतियोगिनिरपेक्ष शून्यरूप से दृष्ट होता है जैसे विशाल दिशा,
काल आदि प्रतियोगिनिरपेक्ष पूर्णरूप से देखे जाते हैं वैसे ही यह भी है