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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verses 50–53

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, verses 50–53 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 50-53

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

उनकी यह रागिता ही रहे अथवा यह रागिता मत रहे। अरागिता से उनका कौन लाभ है या कोन क्षति हे । जीवन्मुक्त भगवान्‌ श्रीविष्णु असुरनिग्रह आदि काम स्वयं जोर शोर से करते हैं ओर इन्द्र आदि द्वारा कराते हें । अवतार की समाप्ति होने पर मृत्यु स्वीकार करते हैं, मृत्यु स्वीकार के अनुकूल शरभ शिकारी आदि द्वारा मारे जाते हैं। समय-समय पर रामआदिरूप से उत्पन्न होते हैं और अभिवृद्धि को प्राप्त होते हैँ । सर्वथा समर्थ होते हुए भी भगवान श्रीहरि प्राणियों के कर्मवशं प्राप्त व्यवहार व्यग्रता का त्याग नहीं कर सकते । उनका प्राणिकर्मवश प्राप्त व्यवहार व्यग्रता के त्याग से न किसी प्रयोजन की सिद्धि है और न उसके ग्रहण से ही किसी प्रयोजन की सिद्धि हे । वह यहाँ यथास्थित ही रहे, ज्यो-का-त्यों ही रहे । शुद्धचिन्मात्ररूपधारी इच्छारहित (निष्काम) हरि भगवान्‌ वासनाविहीन ही रहते हे