Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verses 16–18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, verses 16–18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 16-18
संस्कृत श्लोक
तस्मादनुपमं ज्ञानं समासाद्य दिगन्तरे ।
तस्मिन्नेव समाधाने सोऽतिष्ठद्वर्षपञ्चकम् ॥ १६ ॥
ततो देहं परित्यज्य चित्ते सत्तामुपागते ।
स तत्प्राण इवाकाशं परं निर्वाणमाययौ ॥ १७ ॥
पूर्वः पर्वणि शीतांशुबिम्बपार्श्वे स्थितं वपुः ।
चिन्तयंश्चिरमुन्नष्टदेहश्चन्द्रपुरे स्थितः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
मायाशवल ही जगदात्मक है, वही द्रष्टा और दृश्य के रूप से जगद्रूप मेँ उदित हआ है । जो वस्तु
विश्वात्मा का (मायाशवल का) दृढमात्ररूपशरीरवाली है उसका किससे, कैसे कब क्या होगा ? शुद्ध में
परिणाम, विरवत आदि नहीं हो सकते, यह भाव है।
हे तत्त्वज्ञानी, साध्य ओर असाध्यरूपी मायाशबल की कोन वस्तु दुःसाध्य है जरा बतलाइये
तो ? कुछ भी दुःसाध्य नहीं हे, इसलिए सदा सब जगह सर्वार्थक्रिया की उपपत्ति है, यह भाव हे ।
इसलिए सदा एकरूप इस विपश्चित्-राजासंवित् को, जो प्रबोध की ओर अग्रसर है ओर परमपद
को प्राप्त नहीं हुई तथा एक होती हुई भी अनेकरूप है, सब जगह सब कुछ सम्भव है