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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verses 33–34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, verses 33–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 33

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इसी कारण उन्हें अन्य लोग ये जीवन्मुक्त है यों नहीं पहिचान पाते हैं, किन्तु धारणा से सिद्ध हुए योगियों की तो उन्हे पहचान होती ही है यह जीवन्मुक्त ज्ञानियों और योगियों में दूसरी विलक्षणता है, ऐसा कहते हैं। धारणा आदि वश प्राप्त योग की तरह मोक्ष अन्य पुरुषों द्वारा ज्ञातव्य नहीं है यानी जैसे अन्य लोग धारणावश प्राप्त योग को पहचान लेते हैं वैसे वे मोक्ष की पहचान नहीं कर सकते जैसे शहद आदि की मिठास से उत्पन्न सुख का वर्णन कोई नहीं कर सकता उसका सुख केवल आत्मसंवेद्य है वैसे ही मोक्ष भी केवल आत्मसंवेद्य ही है। शंका: मन का धर्म मोक्ष आमसंवेद्य कैसे है ? समाधान-बन्ध के समान मनोगत मोक्ष की साक्षिरूप स्वानुभव से ही सिद्धि है