Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
अथ तेषां ददर्शासौ व्योम्न्येव व्योमरूपिणाम् ।
संवित्प्राक्तनसंस्काराद्व्योमात्मावनिमण्डलम् ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
योगिर्यो की दृष्टि से सारा प्रपंच मनोमात्र है ओर मानस कर्मो में मन का सर्वत्र एक साथ व्यवहार
होने में कभी निरकुश स्वातन्त्र्य की हानि नहीं देखी जाती अतः सव क्रियाओं की उपपत्ति है इस आशय
से श्रीवसिष्टजी उत्तर देते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस जगत् में अज्ञानियों की दृष्टि मे जो भूत, भोतिकादि
स्थूल वस्तु है उससे हम ज्ञानियों का कोई वार्ता नहीं है । हम उसकी उपपत्ति की चिन्ता क्यो करें ?
ज्ञानियों की दृष्टि से जो मनोमात्र वस्तु है, वह सर्वत्र अर्थक्रियाकारी जैसे हो सकती हे वैसा कहता
हूँ, सुनो