Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verses 9–15
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, verses 9–15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 9-15
संस्कृत श्लोक
सप्तद्वीपाब्धिवलयं पुरपत्तनभूषणम् ।
सुरशैलशिरःपीठं ब्रह्मलोकशिरोमणिम् ॥ ९ ॥
चन्द्रार्कबिम्बनयनं तारामुक्ताकलापकम् ।
विलोलमेघवसनं नानावनतनूरुहम् ॥ १० ॥
देहान्विपश्चितां संविद्ददर्श चतुरोऽपि सा ।
प्राग्वत्कल्पपरावृत्तौ द्यौर्दिगन्तानिवाततान् ॥ ११ ॥
आतिवाहिकसंवित्तेस्तेऽव्योम्नि व्योमतात्मकाः ।
आधिभौतिकदेहत्वभावान्ददृशुरग्रतः ॥ १२ ॥
अस्यात्मकत्वेऽविद्येयं कियती स्यादितीक्षितुम् ।
चत्वारोऽपि प्रवृत्तास्ते संस्कारवशतः पुरः ॥ १३ ॥
दृश्यदर्शनयोरुर्वीमण्डलानुभवाकृतेः ।
निष्ठां द्रष्टुमविद्याया भ्रेमुर्द्वीपान्तराणि ते ॥ १४ ॥
द्वीपसप्तकमुल्लङ्घ्य समहार्णवसप्तकम् ।
विपश्चित्पश्चिमः प्राप घनभूमौ जनार्दनम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
चिन्मात्र ही वस्तु, इस मुख्य पक्ष में सर्वेश्वर की ही सर्वत्र सवार्थिक्रियोपपत्ति है, ऐसा कहते है।
तत्त्वज्ञो की दृष्टि से चिन्मात्रसत्तासामान्य के बिना दूसरा जगद्रूप निःस्वरूप हे । दृश्य के अत्यन्त
अभाव का ज्ञान होने पर सृष्टि ओर प्रलय की दृष्टि का क्षय होने के पश्चात चिन्मात्रसत्तासामान्य में
निरन्तर विश्रान्त हुए सर्वेश्वर की यहाँ पर सदा सर्वता स्वत्मिता ही है । भला बतलाइये तो उसका कोन
कैसे कहाँ पर क्योकर निरोध कर सकता है ? सर्वगामी ओर सर्वात्मा का जब जहाँ पर जैसे भान होता
है तब वहाँ पर वैसा भान होता है । सर्वात्मा में क्या वस्तु नहीं हे । अतीत, वर्तमान ओर भविष्यत्, का
त्याग न कर रहे सत्तासामान्यस्वरूप सर्वात्मा में सदा स्थित ही हैं, ऐसा आप जानें । माया से उल्लास
को प्राप्त हुआ प्रपंच न तो उत्पन्न हुआ और न विनष्ट हुआ, विज्ञानघन ही ज्यो -का-त्यों स्थित है ।
इसलिए ये तीनों जगत् विज्ञानघनरूप ही हैं आकाशता का त्याग न करता हुआ (अपनी सत्ता से
उसपर अनुग्रह करता हुआ) सर्वात्मा ही आकाशरूप से स्थित है । भाव यह कि अविकृत सच्चिदात्मा
की ही आकाश आदिरूप से स्थिति हे