Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, Verses 29–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 126, verses 29–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 126 · श्लोक 29-32

संस्कृत श्लोक

ततो भूगोलकोऽयं हि समाप्तो वर्तुलाकृतिः । नभःशून्यं महाखातं ततस्तिमिरपूरितम् ॥ २९ ॥ तत्रालिकज्जलतमालनभोन्तरालनीलं तमो न च मही न च जंगमादि । नालम्बनं न च मनागपि वस्तुजातं किंचित्कदाचिदपि संभवतीति विद्धि ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, और भी सुनिये, जीवन्मुक्तशरीरवाले ज्ञानयोगियों को व्युत्थानकाल में ही अन्य पदार्थ की प्रतीति होती है । भाव यह कि जीवन्मुक्तो को व्यवहार काल में ही देहादिभान होता है, समाधि में तो विदेह कैवल्यसमता ही रहती है, यह विपश्चितो से उनमें विलक्षणता हे मोक्ष भी चित्त का धर्म है, वह चित्त में ही रहता है, देह में नहीं रहता । जो बँधा रहता है, उसके बन्धन की निवृत्ति मोक्ष है । चित्त ही बद्ध रहता है आत्मा नहीं, अतः मोक्ष भी चित्त का ही धर्म है, अतः समाहितचित्त में ही वह मोक्ष रहता है देहभावापन्न व्युत्थित पुरुष में मोक्ष नहीं रहता । जो देहधर्म है -देहाधीन व्यवहार है वह जीवन्मुक्त के भी शरीर से नहीं हटता, अतः अन्य पदार्थ की प्रतीति की उपपत्ति होती है । तब तो जीवन्मुक्त का चित्त भी देहभाव प्राप्त होने पर बन्धन को प्राप्त हो जायेगा ? नहीं सो बात नहीं हे । निर्मुक्त चित्त (भलीभाँति मुक्त हुआ चित्त) फिर कभी भी बन्धन में नहीं पडता । वृक्ष से गिरे हुए फलको प्रयत्न से भी कोन बाँध सका ? जीवन्मुक्त पुरुषों का भी शरीर धर्मो से अनुगत रहता है, किन्तु शरीरगत उनका चित्त अविचल रहता है उसमें देहधर्म व्याप्त नहीं होते भाव यह कि मुक्त ओर अमुक्त पुरुषों में देह धर्मानुवृत्तिसमान है चित्त धर्मानुवृत्ति उनकी एक सी नहीं है