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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 111

एक सौ नौवाँ सर्ग समाप्त एक सो दसवाँ सर्ग नगर के समीप पहुँचे हए शत्रुओं के साथ चारों ओर हुए घमासान संग्राम का विस्तृत वर्णन।

23 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, इस बीच में वहाँ चारों ओर नगर के समीप पहुँचे हुए…
  2. Verses 2–9उक्त युद्ध मेँ नगर और गाँव लूटे गये, प्रजामण्डल में महाव्याकुलता छा गई, आग की लपटों से शर…
  3. Verses 10–11टकराने के कारण कर्णकटु टकार ध्वनि हो रही थी । दुर्गो के सन्धिप्रदेशों मे बनी हुई कुटियों…
  4. Verses 12–15घटाटोप के साथ टूटे फूटे हुए चलने मेँ रुकावट डालनेवाले तोमर इधर उधर लुढके हुए थे, अटारियों…
  5. Verse 16लगातार बह रही बाण-नदी के वेग से आकाशरूपी महासागर भर गया था, चल रहे चक्र, भाले, तलवाररूपी…
  6. Verse 17और उड़ रहे थे, बाणरूपी जलतरंगों से पीडित हुए योद्धाओं के आयुरूपी जलचर टूक-टूक हो रहे थे
  7. Verse 18कहीं पर आपस में टकरा रहे शस्त्रास्त्रं से निकली हुई ज्वालाओं से आकाश जल रहा था, देवत्व की…
  8. Verse 19धूलिरूपी मेघों में चक्ररूपी बिजलियाँ कौंध रही थी, शस्त्रास्त्रं से ठसाटस भरा होने के कारण…
  9. Verses 20–24बाणों की वृष्टि कर रहे महायोद्धाओं के घटाटोप से गरज रहे शत्रु योद्धाओं से संग्राम-भूमि बड…
  10. Verses 25–27उक्त संग्राम गजरूपी शूरवीर सामन्तो के मदजल का शोषण कर रहा था, वहाँ दूसरों को मारने मेँ अत…
  11. Verses 28–30हाथी पर सवार होकर युद्ध करनेवाले तथा रथियों के परस्पर युद्ध में बेचारे हाथियों के गण्डस्थ…
  12. Verses 31–32अभिमानरूपी उन्माद वायु के कारण उन्मत्त हुए योद्धाओं द्वारा प्रणत (शरणागत) लोगों पर भी प्र…
  13. Verses 33–34युद्धभूमि का गगनरूपी आँगन मन्दराचल के आघात से उछले हुए क्षीरसागर के जल के समान सुन्दर छत्…
  14. Verse 35उस युद्ध में बहुत बड़ा झुण्ड बाँधकर अनायास प्रहार करनेवाले असंख्य राक्षसां द्वारा चुपचाप…
  15. Verse 36चमचमा रहे भालों की श्रेणियों से भालों के वन ऐसे प्रतीत हो रहे भालों से लड़नेवाले योद्धाओं…
  16. Verse 37ताल ठोकने आदि से उत्पन्न महान्‌ चट चट शब्दों से विशाल वृक्षों के टूटने की-सी ध्वनि हो रही…
  17. Verses 38–40सब प्रजा अपना घर द्वार छोड़कर दूरदेशं में भाग गई थी, हथियारों के चारों ओर चलने से युद्धदर…
  18. Verse 41आकाश में चल रहे हथियार प्रक्षणी द्वारा फेंके गये पत्थर की टक्कर से चूर-चूर हो रहे थे और य…
  19. Verse 42उस युद्ध में शूरो के सिंहनाद पर्वतो की गुफाओं में पहुँचकर प्रतिध्वनियों से मिल गये थे ओर…
  20. Verse 43उक्त युद्धभूमि हथियाररूपी अग्नि से तथा चारों ओर फैली हुई अग्नि से भूनी गई थी तथा पूर्ववर्…
  21. Verses 44–45मरे हुओं से अवशिष्ट, बलशाली, स्वामी की वंचना न करनेवाले, हृदय में इश्वर को धारण करनेवाले,…
  22. Verse 46अत्यन्त शूरवीर योद्धा कटे हुए सुन्दर सुन्दर हाथीरूप कमलों से भरी हुई युद्ध भूमि के आकाश म…
  23. Verses 47–49गुलेल से फेंके गये पत्थरों के प्रवाहरूपी नदियों की ध्वनियां से तुरन्त ही बह कर आकाश में उ…