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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, Verses 47–49

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, verses 47–49 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

विद्युद्वलयविस्तारकारिसंघट्टघर्षणैः । शरशक्तिगदाप्रासभिन्दिपालादिवर्षणैः ॥ ४७ ॥ सर्वदिक्कमसंख्यानि बलानि बलशालिनाम् । भूभृतां विद्रवन्त्याशु विनेशुर्मशकौघवत् ॥ ४८ ॥ उद्दामपावकवनोपमहेतिसार्थमेघानलाकुलजनाशनिवर्षपातैः । आसन्बलानि चपलाब्धिजलाबलानि पर्याकुलानि वडवाग्निमिवाविशन्ति ॥ ४९ ॥

हिन्दी अर्थ

गुलेल से फेंके गये पत्थरों के प्रवाहरूपी नदियों की ध्वनियां से तुरन्त ही बह कर आकाश में उड़े हुए मस्तकं की फुफकारों से, बाणरूपी जल बरसा रहे सैनिकों के सिंहनादं से ओर आकाश में फैल रहे शस्त्रासत्रों की सरसराहट से एवं सातघोड़ों तथा हाथियों के हिनहिनाने ओर चिंघाड़ने से व्याप्त युद्ध ने सबके कानों को बहिरा बना दिया था । वह रणस्थल कहीं पर भी सूराखसन्धि-सम्बन्ध से रहित पत्थर के समान जड़ हो गया था