Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, Verses 28–30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, verses 28–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 28-30
संस्कृत श्लोक
सनाराचा महावर्षहर्षलोत्पातपीवराः ।
नागाश्च युगपर्यन्तस्फुटिताद्रीन्द्रजा इव ॥ २८ ॥
तेनास्त्रवर्षवेगेन धुतः सोऽरिबलार्णवः ।
झटित्येव न कालेन पांसुराशिरिवाभितः ॥ २९ ॥
सलिलाशनिशस्त्राणामासारैश्चण्डमारुतैः ।
सरांसीव विसेतूनि सैन्यानि परिदुद्रुवुः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
हाथी पर सवार होकर युद्ध करनेवाले तथा रथियों के परस्पर युद्ध
में बेचारे हाथियों के गण्डस्थल क्षतविक्षत हो गये थे, सकल मदोन्मत्त गन्धगजो (५) के मदजल
उक्त युद्ध में सूख गये थे, मन्दोमत्त हाथियों के तालाबों में घुसने पर सारसो की तरह चीत्कार के
साथ भाग रहे तरुण सामन्त भी वहाँपर हाथियों को छोड़ जा रहे थे । बूढ़े होने पर भी खङ्गविद्या
में सिद्धहस्त भटों की सेना द्वारा अपनी खड्गप्रहरणता प्रकटन का (2) समर्थन किया जा रहा था।
योद्धाओं की सेना के न आने पर भी उनके आगमन की भ्रान्ति से भगदड़ होने पर परस्पर पैरों से
कुचले गये मनुष्य अधमरे हो गये थे, अतएव दिन जैसे सूर्य की शरण में रहता है वैसे ही राजा के
पैरों की शरण में वे अपने आप चले गये थे