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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, Verses 33–34

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, verses 33–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 33,34

संस्कृत श्लोक

विलुठत्पुष्टपाषाणपृषद्रक्तद्रवावचः । घोरैर्घुरघुरारावैरलं हृदयभङ्गदः ॥ ३३ ॥ उह्यमानवृहद्दन्तिदन्तद्रुमविघट्टनैः । स्फूर्जच्चटचटारावतर्जितोद्गर्जिताम्बुदः ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

युद्धभूमि का गगनरूपी आँगन मन्दराचल के आघात से उछले हुए क्षीरसागर के जल के समान सुन्दर छत्रो से आच्छादित तथा शच्त्रासत्ों के समूह रूपी फूलों से युक्त था । उक्त युद्धस्थल में प्रमथगणों, गन्धर्वो तथा देवताओं द्वारा शूरवीर योद्धाओं के उत्साह आदि के गीत गाये जा रहे थे, उनकी (गणो ओर गन्धर्वो की) कान्ति से चंचल ध्वजाग्रं से तथा हथियाररूपी मद्य से उन्मत्त होने के कारण योद्धा वहाँ पर बलरामरूप बन गये थे