Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, Verses 44–45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, verses 44–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 44,45
संस्कृत श्लोक
पङ्किलाखिलभूपीठैः सलिलोपप्लुतस्थलैः ।
सितशैत्यवशाश्यानधाराकृतखपञ्जरैः ॥ ४४ ॥
समग्रनगरग्रामगृहज्वलितवह्निभिः ।
प्रजाश्वेभपदातीनामाक्रन्देनापि घर्घरैः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
मरे हुओं से अवशिष्ट, बलशाली, स्वामी की वंचना न
करनेवाले, हृदय में इश्वर को धारण करनेवाले, उत्तम योद्धारूपी कैलासं से वह युद्ध चारों ओर
परिवेष्टित था । कैलास भी अत्यन्त पवित्र, सारवान् और श्रीशंकरजी का आधार है । जिनका रण
से भागकर जीना मरने के समान अप्रिय है और रण में मरना जीने के समान प्रिय है ऐसे उदार
पुरुषों से त्रैलोक्य भी जीता जाता है । वे ही काल के भी काल होते हैं यानी परमपद प्राप्त हैं, जैसे
कहा है-दो ही पुरुष तो सूर्यमण्डल का भेदन कर परमपद को प्राप्त-होते हैं, योगयुक्त संन्यासी
और रण में सम्मुख मारा गया योद्धा