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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, Verses 10–11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, verses 10–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 10,11

संस्कृत श्लोक

शरसीकरनीरन्ध्रं मकरव्यूहसंकुलम् । वारणव्यूहवलितं तरङ्गव्यूहविस्तृतम् ॥ १० ॥ चक्रावर्तवहद्व्यूहकल्लोलकलितान्तरम् । चलद्रथशतावर्तं पताकालहरीगणम् ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

टकराने के कारण कर्णकटु टकार ध्वनि हो रही थी । दुर्गो के सन्धिप्रदेशों मे बनी हुई कुटियों की दीवारों पर श्रेष्ठ योद्धा कोटिदार बाण रोपने मेँ व्यग्र थे, अग्नि की ज्वालाओं से वेष्टित अतएव भग्नप्राय दुर्गसन्धिस्थित अटारियों में पर्यटन द्वारा अग्निछठटा नाच रही थी