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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, Verses 20–24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 111, verses 20–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 111 · श्लोक 20-24

संस्कृत श्लोक

अस्त्रं सस्मार वायव्यं चतुर्दिक्कं च संदधे । धनुषि शिखराधारे त्रिपुरान्त इवोद्यतः ॥ २० ॥ आत्मीयदेशसैन्यानां श्रेयोर्थं शान्तयेऽनलम् । नमस्कृत्याथ जप्त्वाशु स तत्तत्याज दारुणम् ॥ २१ ॥ यथा तथैव तत्याज तस्य साहायकाय सः । पर्जन्यास्त्रं महास्त्रैशं द्विषदातपशान्तये ॥ २२ ॥ तस्मादस्त्रजुषो घोराद्धनुषः परिनिर्गताः । अष्टमूर्तेश्चतुर्दिक्कमाशाकुहरपूरकाः ॥ २३ ॥ निर्ययुर्बाणसरितस्त्रिशूलसरितस्तथा । शक्तीनामुग्रसरितो भुशुण्डीसरितस्तथा ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

बाणों की वृष्टि कर रहे महायोद्धाओं के घटाटोप से गरज रहे शत्रु योद्धाओं से संग्राम-भूमि बड़ी डरावनी लगती थी, पृथिवी को व्याप्त कर रहीं (ढक रहीं) गाड़ियों के आघातों से चूर चूर हुए अन्य गाड़ियों के अवयवभूत काठों में रथ लड़-खड़ा रहे थे, संग्राम भूमि कबन्ध हुए योद्धाओं ओर वेतालो से मिश्रित शत्रुओं से ठसाठस भरी थी, तिल रखने की भी जगह नहीं थी, वेताल श्रेष्ठ श्रेष्ठ योद्धाओं का हृदयकमलरूपी मांस खा रहे थे, शूरवीर पुरुषों द्वारा वीरों के सिर, हाथ, जंघाएँ ओर पैर काटे गये थे, कबन्धो के भुजारूपी वृक्षों की हलचल से आकाशतल वन सा बन गया था, तैर रहे चंचल मुखवाले वेतालो ने हर्ष के आधिक्य से हँसी खुशी से अपनी अपनी पेटियाँ शवों से भरी थीं, कवच पहनने के कारण घटाटोपवाले योद्धाओं की भ्रकुटि से रणभूमि भयंकर थी । वहाँ पर नियमतः स्वयं मरना या दूसरों को मारना यही वीरो का एकमात्र आभूषण था वहाँ प्रहारो को देने ओर अपने ऊपर लेने में असामर्थ्य ही वहाँ पर महती निन्दा थी