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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 109

एक सौ सातवाँ सर्ग समाप्त एक सौ आठवाँ सर्ग अविद्या के विनष्ट हुए बिना कहीं भी जगत्‌ का अन्त नहीं है ।

35 verse-groups

  1. Verses 1–2इस विषय में विस्तार के साथ मनोरंजक अविद्याआख्यान का वर्णन। पूर्ववर्णित संग्राऱपी आविद्या…
  2. Verse 3उक्त सन्देह की दूसरी कोटि को (देशतः कालतः वह कितनी बड़ी है, इस अंश को) लेकर वस्तिष्ठजी उस…
  3. Verse 4लोकालोक पर्वत की सुवर्णशिला से स्वच्छ किसी वस्तु में स्थित चिदाकाश के कोने में, उस कोने क…
  4. Verse 5उसमें जम्बूदीप नामक भूमि का भूषणभूत कोई एक भूमिभाग है । उसमें भी पर्वत, चहारदिवारी, बालू…
  5. Verses 6–7में सुमेरु शोभा पाता है, वैसे ही वह अपनी सभा में शोभा पाता था
  6. Verse 8सर्वत्र उत्तरोत्तर गुणों के उत्कर्ष-वर्णन में प्रवृत्त कवियों की सूक्तियाँ उस विपश्चित्रू…
  7. Verse 9जैसे अपनी कान्ति से दशो दिशाओं को जगमगानेवाले प्रातःकाल में खिले हुए कमल से सूर्य के प्रक…
  8. Verse 10राजा विपश्चित्‌ को सदा ब्राह्मणों के हित का ख्याल रहता था, अतएव देवताओं में वहि के ब्राह्…
  9. Verses 11–12उक्त राजा के मन्त्रियों में से चार मन्त्री, जो अत्यन्त धीर, विपुलबाहुबलशाली, निर्भय सेना…
  10. Verse 13उन मन्त्रियों के कारण वह राजा सकल दिशारूप पहियों का नाभि की तरह आधारभूत बनकर सुदर्शन चक्र…
  11. Verse 14एक समय पूर्व दिशा से एक चतुर गुप्तचर उसके पास आया । उसने एकान्त में राजा से कालगति के समा…
  12. Verse 15"भगवन्‌, विशाल बाहुरूपी वृक्षोपर डाले हुए पृथ्वीरूपी गऊ के बन्धन से आप कभी विमुख नहीं हुए…
  13. Verse 16महाराज, पूर्व दिशा के सामन्त की ज्वर से मृत्यु हो गई है । मानों शत्रुओं को परास्त कर चुके…
  14. Verse 17उनके मरने के उपरान्त दक्षिण दिशा के अधिपति (आपके सामन्त) चारों ओर से पूर्वं ओर दक्षिण दिश…
  15. Verses 18–19उनके मर जाने के उपरान्त पश्चिम दिशा के अधिनायक (आपके सामन्त) ज्यों ही सेना बटोर कर आपकी प…
  16. Verse 20श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, उक्त गुप्तचर जल्दी राजा से यह कह ही रहा था कि प…
  17. Verse 21गुप्तचर ने कहा : महाराज, उत्तर दिशा के अधिनायक (आपके सामन्त) शत्रुओं द्वारा आक्रान्त होकर…
  18. Verses 22–24श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र, यह सुनकर राजा ने विलम्ब को सब वस्तुओं ओर महलों के लिये खतरनाक…
  19. Verse 25श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भय-चकित राजा त्वरापूर्वक यह सव कह ही रहा था कि द्वारपाल ने घबराहट क…
  20. Verse 26द्वारपाल बोला : महाराज, उत्तर दिशा का सेनाधिपति ड्योढ़ीपर खड़ा है जैसे कमल सूर्य के दर्शन…
  21. Verse 27राजा ने कहा : जाओ, बहुत जल्द ही उसे प्रवेश कराओ, उसके मुँह से वृत्तान्त के भली-भाँति श्रव…
  22. Verses 28–30श्रीवसिष्ठजी ने कहा : राजा के यह कहने पर द्वारपाल द्वारा भीतर प्रवेशित सेनाध्यक्ष उत्तर द…
  23. Verses 31–33सेनाधिपति ने कहा : राजन्‌, तीनों दिक्पाल बहुत बड़ी सेना के साथ मानों आपकी आज्ञा से यम को…
  24. Verses 34–37श्रीवसिष्ठजी ने कहा : इसके बाद युद्धभूमि में क्षतविक्षत शरीरवाले अतएव पीडित उत्तरदिशाधिपत…
  25. Verse 38के झुण्ड, जो मांस के वृक्षों से भरे वनके तुल्य है, आकाश में सूँड़ों को उठाते हुए हाथी चिं…
  26. Verse 39घोड़ों के झुण्ड, जो गति के क्रम से पृथिवी की समता, विषमता की नाई समता विषमता कर रहे हैँ,…
  27. Verse 40क्षीरसागर के जल के समान फेनयुक्त आवर्तो की (जलभ्रमियों की) भाँति इधर-उधर वृत्ताकार घूम रह…
  28. Verse 41जैसे प्रलयकाल के सागर का प्रवाह बड़े-बड़े ज्वार भाटों से प्रत्येक दिशा में प्रकट होता है…
  29. Verse 42योद्धाओं के शरीर पर लगे हुए बाण, अस्त्र-शर्त्र, कवच, मुकुट और आवरणों की कान्तियाँ आपके प्…
  30. Verse 43जैसे मछली ओर मगरो के समूह से युक्त चक्राकार जल भ्रमिवाले कल्लोल सागर से आविर्भूत होते हैं…
  31. Verse 44भाले आदि हथियारों की श्रेणियाँ परस्पर टकराने के कारण मानों क्रोधवश भीषण हुंकारों से जलती…
  32. Verse 45उस मण्डल की सीमा में स्थित छावनी से युद्ध के लिए जाते हुए स्वामी ने यह निवेदन करने के लिए…
  33. Verse 46महाराज, शक्ति, ऋष्टि ओर बाणो से युक्त मैं जिन्होंने मुझे आपके पास भेजा था उन स्वामी के सम…
  34. Verse 47श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, गुड़ गुड़ शब्द करके विलीन हुई समुद्र की लहर के समा…
  35. Verse 48राजा के महल में खलबली मच गई, उसकी अवस्था ओंधी से व्याकुल महावन की-सी हो गई । मन्त्री, राज…