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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 109, Verses 1–2

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 109, verses 1–2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 109 · श्लोक 1,2

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । एतस्मिन्नन्तरे सर्वे मन्त्रिणो नृपमाययुः । मुनयो वासवमिव दैत्याक्रान्तनभोभुवम् ॥ १ ॥ मन्त्रिण ऊचुः । देव निर्णीतमस्माभिर्यावन्न विषयोऽरयः । त्रयाणामप्युपायानां दण्डस्तेषु विधीयताम् ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

इस विषय में विस्तार के साथ मनोरंजक अविद्याआख्यान का वर्णन। पूर्ववर्णित संग्राऱपी आविद्या का तत्वज्ञान से त्रैकालिक अम्नत्तापत्तिऊप बाध हुए बिना देशतः या कालत: अन्त हो सकता हैं या नहीं ? यो सन्देह में पड़े हुए श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं । हे मुनीश्वर, यह चिदाकाश की स्वप्ननगरीरूप अविद्या, जो विद्यमान होती हुई भी शून्यरूप अथवा दृश्यरूप है, बाध न होने के कारण जिस पुरुष के प्रति स्फुरित होती हुई विद्यमान है, उस अज्ञानी के प्रति वह कब तक रहती है, उसका क्या स्वरूप है, क्या उपादान है अथवा देशतः कालतः वह कितनी बड़ी है यह सब मुझसे पुनः कहने की महती कृपा कीजिये

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ सातवाँ सर्ग समाप्त एक सौ आठवाँ सर्ग अविद्या के विनष्ट हुए बिना कहीं भी जगत्‌ का अन्त नहीं है ।