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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 109, Verses 22–24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 109, verses 22–24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 109 · श्लोक 22-24

संस्कृत श्लोक

आगतं वार्धकं सर्वभोगसंरम्भमार्जनम् । तस्योपर्यरयो रौद्रा बलवन्तो रणैषिणः ॥ २२ ॥ संभूय सर्वतः प्राप्ताः संदिग्धो वर्तते जयः । तदिहैवानलायास्मै देवाय जयदायिने ॥ २३ ॥ मस्तकाहुतिमेवेमां समुद्यम्य ददामि वै । राजोवाच । कृशानो देव मूर्धाऽयं तुभ्यमाहुतितां गतः ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र, यह सुनकर राजा ने विलम्ब को सब वस्तुओं ओर महलों के लिये खतरनाक समझकर सुन्दर महल से निकलते हुए यह कहा । "राजागण, सामन्त ओर मन्त्रिगण हथियार से लैस कर दिये जाय, शरत्रागार खोल दिए जाय, सबको भीषण अरत्र-शत्त्र बोटि जाय, सैनिक कवच पहन लें पैदल सेनाएँ जल्दी कूच करें, तुरन्त सेना की गिनती की जाय, श्रेष्ठ श्रेष्ठ सैनिकों को प्रोत्साहित किया जाय, सेनाध्यक्ष की नियुक्तियाँ की जाय और चारों ओर गुप्तचरं का जाल बिछाया जाय