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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 109, Verses 11–12

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 109, verses 11–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 109 · श्लोक 11,12

संस्कृत श्लोक

इत्युक्त्वा नृपतिः स्नातो महारम्भोऽपि स क्षणात् । प्रावृषीव नवोद्यानं गङ्गाजलधरैर्घटैः ॥ ११ ॥ अथ प्रविष्टोऽग्निगृहं पूजयित्वा हुताशनम् । आदरेण यथाशास्त्रं चिन्तयामास भूमिपः ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त राजा के मन्त्रियों में से चार मन्त्री, जो अत्यन्त धीर, विपुलबाहुबलशाली, निर्भय सेना से प्रभावान्वित थे, चार दिशाओं मे चार सागरो की भाँति शत्रुसेना के निरोध के साथ देशव्यवस्था करने के लिए नियुक्त थे । सागर मछलियों ओर मगरो के झुण्ड के झुण्ड से भरे रहते हैं तो मन्त्री हाथी, घोड़ों से युक्त थे, समुद्र आवर्तो की (जलभ्रमियों की) राशियों से भरे होते हैं तो मन्त्री सेना से धिरे रहते थे