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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 109, Verses 28–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 109, verses 28–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 109 · श्लोक 28-30

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इत्युक्त्वा स महीपालः खङ्गमादाय चिच्छिदे । शिरः कमलमालोलं लीलयेवाशु बालकः ॥ २८ ॥ छिन्नमेष शिरो यावज्जुहोत्यसितवर्त्मने । तावच्छरीरेण सह पपाताग्नौ स पार्थिवः ॥ २९ ॥ भुक्त्वाथ वह्निस्तं देहं ददावस्मै चतुर्गुणम् । महतामुपयुक्तं हि सद्य एवाभिवर्धते ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : राजा के यह कहने पर द्वारपाल द्वारा भीतर प्रवेशित सेनाध्यक्ष उत्तर दिशा के अधिपति को राजा ने प्रणाम करते देखा, उसके संपूर्णं अंग क्षत-विक्षत थे, प्रत्येक अवयव में प्राण व्याप्त थे, साँस जोर से चल रही थी, निर्बल होने के कारण शत्रु द्वारा जीता गया था । उसने धीरता से देहव्यथा सहनकर लगातार साँस लेते हुए प्रणामपूर्वक राजा से जल्दी जल्दी ये वाक्य कहे