Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 109, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 109, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 109 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
प्रणयोऽनुप्रवेशो वा न कदाचन यः कृतः ।
अधुना तेषु तं देव कुर्यात्तेषु कथैव का ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त सन्देह की दूसरी कोटि को (देशतः कालतः वह कितनी बड़ी है, इस अंश को) लेकर
वस्तिष्ठजी उसे पुष्ट करने के लिए (विपश्वित्” कथा छुनाने के उद्देश्य स्रे श्रीरामचन्द्रजी को
सावधान करते हैं
जिन अज्ञानियों में भूतल आदिरूप अविद्या विद्यमान है, उनका जैसे ब्रह्म मे देशतः कालतः
अन्त (परिच्छेद) नहीं है वैसे ही इसमें भी देशतः कालतः अन्त नहीं है । इस विषय में उपपत्ति
करानेवाली इस कथा को सुनिये