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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 109, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 109, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 109 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

आस्फाल्यन्तां धनूंष्युच्चैः क्वणन्तु गुणपङ्क्तयः । भवन्तु जलदश्यामाः ककुभः खण्डमण्डलैः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

सर्वत्र उत्तरोत्तर गुणों के उत्कर्ष-वर्णन में प्रवृत्त कवियों की सूक्तियाँ उस विपश्चित्रूप चरमसीमा (अवधि) से गुणों की अनन्तता ओर निरुपता के कारण वर्णन न कर सकने से लौट जाती थीं (वर्णन नहीं कर सकती थीं) । फिर भी कविजन उसका सत्संग करते ही थे, क्योकि उससे कवियों की पर्वत के तुल्य विशाल स्थिर, सम्पत्ति, ख्याति और गुणों के उत्कर्षं से उत्पन्न शोभा प्राप्त होती थी । जैसे मेरु अपने आश्रित लोगों मृगो , तृणों और झाड़ियों को अपनी कान्ति से स्वर्णमय बना देता है वैसे ही वह भी सम्पत्ति प्रदान कर उन्हे स्वर्णमय बना देता था