Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 101
सौवाँ सर्ग समाप्त एक सौ एकवाँ सर्ग सर्वत्र सदा निर्मल संवित्रूपी एक आत्मा का साक्षात्कार कर रहे पुरुष की, भय के हेतुओं की प्राप्ति न होने से, निर्भयस्थिति का वर्णन।
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- Verse 1केवल चिन्मात्र ही तत्व है, ऐसा ज्ञान हो जाने पर सभी वादियों की अभय पद में जिस तरह प्रतिष्…
- Verse 2उका उपपादन करते हुए उसका फल कहते हैं / और वह चिन्मात्र निर्मल आकाश ही है । द्रष्टा और दृश…
- Verse 3बोद्ध को भी सम्मत हैं, किन्तु क्षणिक विज्ञान असार है इसलिए उसका मत उपेक्षणीय हैं, यह कहते…
- Verse 4कूटस्थ संवित् का ही विवर्तय स्वप्न जगत् है, इस हमारे प्रिद्धान्त में तो राग-द्वेष की कि…
- Verse 5अथवा यह हेय है और यह उपादेय हैं यों विकल्पाध्यास भले ही रहे, तो भी संविदाकाशे कोई अन्तर न…
- Verse 6ससार के स्री पदार्थ एकमात्र अविनाशी स्रंविदृरुप ही हैं; इसलिए उनके जन्म, मरण आदि की भी सं…
- Verse 7मैं संविदाकाशरूप ही हूँ, आप भी संविदाकाशरूप ही हैं तथा हम दोनों के अतिरिक्त ये जितने जीव…
- Verse 8सी संविद्रप हैं जब यह एक निश्चित प्रिद्धांत हैं तो सवित् से भिन्न सवेद क्चता ही क्या (७)…
- Verse 9कहिये, उस संवित् के अतिरिक्त नित्य सद्वस्तु क्या है ? और आप यह भी कहिये कि यदि वह मरती ह…
- Verse 10इन सब बातों का निचोड़ यह निकला कि स्रंविदकाश ही सभी वादियों के अपने-अपने अभिमत पदार्थो के…
- Verse 11अल्यवादी को आये कर, उसका सर्वप्रथम नाम लेकर उक्त अर्थ का विस्तार से वर्णन करते हैं / हे श…
- Verse 12कोई (१) मदिरा मद के तुल्य (%) (देहाकार में परिणत भूतधर्मभूत), कोई (२) पुरुष, कोई (३) चिदा…
- Verse 13इस तरह अनेक वादियों द्वारा अनेक प्रकार की कल्पना करने पर भी चिति के स्वरूप के विष्य में क…
- Verse 14हे श्रीरामचन्द्रजी, मेरे सारे अंग चूर्ण-चूर्ण हो जाय, या सुमेरु पर्वत के सदृश विशाल हो जा…
- Verse 15हम लोगों के पितामह आदि के शरीर मर गये, किन्तु उनकी चिति तो नहीं मरी । यदि वह भी मर जाती,…
- Verse 16(भ) जैसे अन्नादि विविध वस्तुओं का संमिश्रण ही मदरूप में परिणत हो जाता है वैसे ही देहाकार…
- Verse 17इस तरह संविद् के नाश का संभव न होने से जगद्रूप स्फुरणवाला उदय ओर अस्त से रहित अविनाशी चि…
- Verse 18चिदाकाशरूपी स्फटिक पर्वत अपने अन्दर स्वयं जगत्प्रकाश को धारण करता हुआ स्वततत्वसाक्षात्का…
- Verse 19ज्यों-ज्यों ज्ञान प्रबल होता जाता हैं त्यो- त्यो अज्ञानजनित यह जगत् भी नष्ट होता जाता है…
- Verse 20जैसे सागर स्वयं ही अपने स्वरूपभूत जलप्रवाह, तरंग आदि में आवर्त, फेन, बुद्बुद आदि रूप अंग…
- Verse 21चिन्मात्र ही पुरुष है, वह आकाशवत् नित्य है, कभी भी नष्ट नहीं होता, इसलिए मैं नष्ट होता ह…
- Verse 22जीर्ण शरीर के त्याग से अत्यन्त नूतन शरीर की प्राप्ति में निमित्तशृत मृत्यु के उपस्थित होन…
- Verse 23पुनर्जन्म कदापि नहीं होता, यदि यही मत दुम्हारे हृदय में बेटा हुआ हैं, तो भी दुग्हें विषाद…
- Verse 24इस प्रकार जब जन्म और मरण के रहते भी दुःख की प्राप्ति नहीं है, तो फिर इनकी अभावदशा में भला…
- Verse 25मृत प्राणी को पुनः देह का लाभ होता है या नहीं; यह सन्देह बना रहने से मृत्यु से भय माननेवा…
- Verse 26मृत्यु के बाद कुकर्मियों को नरक आदि के श्रवण से यदि भय होता है, तो फिर जीवित प्राणियों को…
- Verse 27इसलिए समान भय होने से आप कुकुर्म ही न करें. यह कहते हैं / कुकर्मों से जो भय है, वह तो इस…
- Verse 28मैं मर जाऊँगा, मर जाऊँगा, मर जाऊँगा, यही बराबर कहा करते हैं, मरने के बाद भी मैं चिद्रूप स…
- Verse 29परमार्थ ट्वष्टि से तो जन्म और मरण की प्राप्ति नहीं है, यह कहते हैं / विचार कर देखिये न, व…
- Verse 30ज्ञानपरिपूर्ण महात्माओं का इच्छाशून्य व्यवहार होने से उन्हें कदापि दुःख ग्राप्त नहीं होता…
- Verse 31निर्भय होकर उपभोग करता है
- Verse 32बीच-बीच में यानी देश में जब किसी तरह का उपद्रव आकर खड़ा हो जाता है या दुर्धिक्ष पड़ जाता…
- Verse 33निर्विकल्प समाधि में निमग्नबुद्धि पुरुष न तो मृत्यु से दुःख को प्राप्त होता है और न जीवन…
- Verse 34इस सर्य में कही गई बातों का स्रंक्षिप्तरुप से उपसंहार करते है/ हे श्रीरामचन्द्रजी, जीवन-म…