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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 101

सौवाँ सर्ग समाप्त एक सौ एकवाँ सर्ग सर्वत्र सदा निर्मल संवित्रूपी एक आत्मा का साक्षात्कार कर रहे पुरुष की, भय के हेतुओं की प्राप्ति न होने से, निर्भयस्थिति का वर्णन।

34 verse-groups

  1. Verse 1केवल चिन्मात्र ही तत्व है, ऐसा ज्ञान हो जाने पर सभी वादियों की अभय पद में जिस तरह प्रतिष्…
  2. Verse 2उका उपपादन करते हुए उसका फल कहते हैं / और वह चिन्मात्र निर्मल आकाश ही है । द्रष्टा और दृश…
  3. Verse 3बोद्ध को भी सम्मत हैं, किन्तु क्षणिक विज्ञान असार है इसलिए उसका मत उपेक्षणीय हैं, यह कहते…
  4. Verse 4कूटस्थ संवित्‌ का ही विवर्तय स्वप्न जगत्‌ है, इस हमारे प्रिद्धान्त में तो राग-द्वेष की कि…
  5. Verse 5अथवा यह हेय है और यह उपादेय हैं यों विकल्पाध्यास भले ही रहे, तो भी संविदाकाशे कोई अन्तर न…
  6. Verse 6ससार के स्री पदार्थ एकमात्र अविनाशी स्रंविदृरुप ही हैं; इसलिए उनके जन्म, मरण आदि की भी सं…
  7. Verse 7मैं संविदाकाशरूप ही हूँ, आप भी संविदाकाशरूप ही हैं तथा हम दोनों के अतिरिक्त ये जितने जीव…
  8. Verse 8सी संविद्रप हैं जब यह एक निश्चित प्रिद्धांत हैं तो सवित्‌ से भिन्न सवेद क्चता ही क्या (७)…
  9. Verse 9कहिये, उस संवित्‌ के अतिरिक्त नित्य सद्वस्तु क्या है ? और आप यह भी कहिये कि यदि वह मरती ह…
  10. Verse 10इन सब बातों का निचोड़ यह निकला कि स्रंविदकाश ही सभी वादियों के अपने-अपने अभिमत पदार्थो के…
  11. Verse 11अल्यवादी को आये कर, उसका सर्वप्रथम नाम लेकर उक्त अर्थ का विस्तार से वर्णन करते हैं / हे श…
  12. Verse 12कोई (१) मदिरा मद के तुल्य (%) (देहाकार में परिणत भूतधर्मभूत), कोई (२) पुरुष, कोई (३) चिदा…
  13. Verse 13इस तरह अनेक वादियों द्वारा अनेक प्रकार की कल्पना करने पर भी चिति के स्वरूप के विष्य में क…
  14. Verse 14हे श्रीरामचन्द्रजी, मेरे सारे अंग चूर्ण-चूर्ण हो जाय, या सुमेरु पर्वत के सदृश विशाल हो जा…
  15. Verse 15हम लोगों के पितामह आदि के शरीर मर गये, किन्तु उनकी चिति तो नहीं मरी । यदि वह भी मर जाती,…
  16. Verse 16(भ) जैसे अन्नादि विविध वस्तुओं का संमिश्रण ही मदरूप में परिणत हो जाता है वैसे ही देहाकार…
  17. Verse 17इस तरह संविद्‌ के नाश का संभव न होने से जगद्रूप स्फुरणवाला उदय ओर अस्त से रहित अविनाशी चि…
  18. Verse 18चिदाकाशरूपी स्फटिक पर्वत अपने अन्दर स्वयं जगत्‌प्रकाश को धारण करता हुआ स्वततत्वसाक्षात्का…
  19. Verse 19ज्यों-ज्यों ज्ञान प्रबल होता जाता हैं त्यो- त्यो अज्ञानजनित यह जगत्‌ भी नष्ट होता जाता है…
  20. Verse 20जैसे सागर स्वयं ही अपने स्वरूपभूत जलप्रवाह, तरंग आदि में आवर्त, फेन, बुद्बुद आदि रूप अंग…
  21. Verse 21चिन्मात्र ही पुरुष है, वह आकाशवत्‌ नित्य है, कभी भी नष्ट नहीं होता, इसलिए मैं नष्ट होता ह…
  22. Verse 22जीर्ण शरीर के त्याग से अत्यन्त नूतन शरीर की प्राप्ति में निमित्तशृत मृत्यु के उपस्थित होन…
  23. Verse 23पुनर्जन्म कदापि नहीं होता, यदि यही मत दुम्हारे हृदय में बेटा हुआ हैं, तो भी दुग्हें विषाद…
  24. Verse 24इस प्रकार जब जन्म और मरण के रहते भी दुःख की प्राप्ति नहीं है, तो फिर इनकी अभावदशा में भला…
  25. Verse 25मृत प्राणी को पुनः देह का लाभ होता है या नहीं; यह सन्देह बना रहने से मृत्यु से भय माननेवा…
  26. Verse 26मृत्यु के बाद कुकर्मियों को नरक आदि के श्रवण से यदि भय होता है, तो फिर जीवित प्राणियों को…
  27. Verse 27इसलिए समान भय होने से आप कुकुर्म ही न करें. यह कहते हैं / कुकर्मों से जो भय है, वह तो इस…
  28. Verse 28मैं मर जाऊँगा, मर जाऊँगा, मर जाऊँगा, यही बराबर कहा करते हैं, मरने के बाद भी मैं चिद्रूप स…
  29. Verse 29परमार्थ ट्वष्टि से तो जन्म और मरण की प्राप्ति नहीं है, यह कहते हैं / विचार कर देखिये न, व…
  30. Verse 30ज्ञानपरिपूर्ण महात्माओं का इच्छाशून्य व्यवहार होने से उन्हें कदापि दुःख ग्राप्त नहीं होता…
  31. Verse 31निर्भय होकर उपभोग करता है
  32. Verse 32बीच-बीच में यानी देश में जब किसी तरह का उपद्रव आकर खड़ा हो जाता है या दुर्धिक्ष पड़ जाता…
  33. Verse 33निर्विकल्प समाधि में निमग्नबुद्धि पुरुष न तो मृत्यु से दुःख को प्राप्त होता है और न जीवन…
  34. Verse 34इस सर्य में कही गई बातों का स्रंक्षिप्तरुप से उपसंहार करते है/ हे श्रीरामचन्द्रजी, जीवन-म…