Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
इदं हेयमुपादेयं वेति संवित्खमात्मनि ।
निर्मले निर्मलं भाति केवात्र तदतद्दृशौ ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा यह हेय है और यह उपादेय हैं यों विकल्पाध्यास भले ही रहे, तो भी संविदाकाशे
कोई अन्तर नहीं है, इस आशय से कहते हैं /
यह हेय है अथवा यह उपादेय है, यह विकल्पाध्यास भी निर्मल संविदाकाशरूप ही हे । उक्त
निर्मल संविदाकाश भी निर्मल आत्मा में ( संविदाकाश में ही अवभासित हो रहा है, अतः यहाँ पर
इष्ट या यह अनिष्ट है यों दो तरह की दृष्टि कैसी ?