Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
मध्यमध्यगतान्दोषान्देशकालवशोदितान् ।
अनादृत्यान्तरेवास्ते सुप्तधीरवहेलयन् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
बीच-बीच में यानी देश में जब किसी तरह का उपद्रव आकर खड़ा हो जाता है या दुर्धिक्ष
पड़ जाता है तब भी ज्ञानी पुरुष को दुःख नहीं प्राप्त होता, क्योकि उस समय वह कहीं एकान्त
पर्वत की गुफा में समाधि्ुख का अनुभव करके उस दुःखग्रस्त काल की अवहेलना कर देता
हैं, यह कहते हैं।
बीच-बीच में आ टपके देशकाल के वश उदित हुए नानाप्रकार के दोषों का अनादर करके
उनकी अवहेलना करता हुआ कहीं एकान्त पर्वत की गुफा में निर्विकल्प समाधि में सुप्तबुद्धि पुरुष
स्थित रहता है