Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
संविदो नास्ति संवेद्यं स्वयं संवेद्यतामिता ।
चित्त्वादतो विशालाक्ष द्वितैकत्वे क्व वा स्थिते ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
सी संविद्रप हैं जब यह एक निश्चित प्रिद्धांत हैं तो सवित् से भिन्न सवेद क्चता ही क्या
(७) बृहस्पति ने रजिपुत्रों तथा असुरों को विमोहित करने के लिए बुद्धशास्त्र की रचना की
थी, यह मत्स्यपुराण आदि में प्रसिद्ध है ।
(८) विज्ञान से अतिरिक्त जगत् नहीं है, यह तो वह भी मानता है, लेकिन विज्ञान को वह
नित्य नहीं मानता, क्षणिक मानता है, सिर्फ इसी एक उसके क्षणिक अंश में हमें वाद है ।
(03) जन्म, मरण आदि ।
है 2 अपने में ही स्वस्वे्ाता की कल्पना तो अपने कंधेपर अपने को चढ़ाने की कल्पना के
जैकी ही है, यह कहते हैं।
हे विशालनयन श्रीरामचन्द्रजी, संवित् का कोई संवेद्य नहीं है । यदि स्वयं ही यह संवित्
संवेद्यता को प्राप्त हो तो चिद्रूप इससे अन्य संवेद्यतालक्षण क्रिया-कर्म भेदरूप द्वित्व अथवा उससे
व्यावृत्त एकत्व-ये दोनों कहाँ रहे ?