Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
न विद्यते परो लोको बार्हस्पत्यस्य यस्य तु ।
विदोऽन्यत्तस्य किं सारं रागद्वेषावतः कुतः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
बोद्ध को भी सम्मत हैं, किन्तु क्षणिक विज्ञान असार है इसलिए उसका मत उपेक्षणीय हैं, यह
कहते हैं /
बृहस्पति द्वारा (७) प्रणीत बुद्धशास्त्र के अनुगामी जिस क्षणिकवादी बौद्ध के मत से क्षणिक
विज्ञान से अतिरिक्त जगत् नहीं है, उसके मत में भी विषयों का सर्वथा अभाव होने के कारण
ही राग-द्वेष कहाँ से हो सकते हैं, उनकी प्राप्ति ही नहीं है । किन्तु संवित् से अन्य उसके
मत में नित्य पुरुषार्थरूप सार ही क्या है कि जिसकी संभावना से वह उस संवित् की नित्यता
स्वीकार नहीं करता (८)