Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
संविदाकाशमेवाहं भवानपि जना अपि ।
म्रियामहे नो कदाचित्संवित्किल कदा मृता ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
मैं
संविदाकाशरूप ही हूँ, आप भी संविदाकाशरूप ही हैं तथा हम दोनों के अतिरिक्त ये जितने जीव
हैं, हे श्रीरामचन्द्रजी, वे भी सब संविदाकाशरूप ही हे । हम लोग कभी मरते नहीं, इसमें तनिक भी
सन्देह नहीं है । बतलाइये तो सही संवित् क्या आजतक कभी मरी है ?