Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 101, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 101 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
देहाद्देहान्तरप्राप्तौ नव एव महोत्सवः ।
मरणात्मनि किं मूढा हर्षस्थाने विषीदथ ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जीर्ण शरीर के त्याग से अत्यन्त नूतन शरीर की प्राप्ति में निमित्तशृत मृत्यु के उपस्थित होने
पर हर्ष मनाना ही उचित हैं. शोक करना उचित नहीं है, यह कहते हैं।
जीर्ण शरीरत्याग से अन्य नूतन शरीर की प्राप्ति होने पर तो एक महान् नवीन उत्सव ही मनाना
चाहिये। अरे मूढ पुरुषों, हर्षरूप मरण के उपस्थित होने पर तुम लोग विषाद क्यों करते हो ?