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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 10

नौवाँ सर्ग समाप्त दसवाँ सर्ग निर्विकार ओर कारणशून्य ब्रह्म ही यह सब स्थित है,यह जगत्‌ कभी कहीं नहीं था, यह वर्णन ।

19 verse-groups

  1. Verse 1ब्रह्म में जयत्‌ का अपलाप चिद्ध करने के निमित्त उसकी जडता का खण्डन करने के लिए जड़रूप से…
  2. Verse 2(८) तात्पर्य यह है कि यदि वह जगद्रूप स्फुरित होता है, तो फिर वह चेतन ही है, चेतन से इतर न…
  3. Verse 3श्रलयकाल में भी अचिद्गरप जगत्‌ सूक्ष्मरृप से ब्रह्म में स्थित रहता ही है” जो श्रुति और स्…
  4. Verse 4वास्तविक द्वष्टि से तो माया के अस्नत्त्त होने के कारण निर्विकार अद्वितीय वस्तु में किसी त…
  5. Verse 5तथा इस सृष्टिरचना में अकारण ब्रह्म में कोई कारण नहीं है । जगत्‌ आदि कुछ भी इससे न तो उत्प…
  6. Verse 6कारण का अत्यन्त अभाव होने से जगत्‌ आदि कुछ भी उत्पन्न नहीं होता । मरुस्थल में जल की नाई स…
  7. Verse 7अज, शान्त और अनन्त ब्रह्म ही सब कुछ है, अंतःकरण का अभाव होने से यह निश्चित हो गया है कि स…
  8. Verse 8इसलिए हे विद्याधर, तुम शिला के उदर के समान तथा आकाशकोश के सदृश हो । ब्रहौकघनस्वरूप होने क…
  9. Verse 9हे विद्याधर, तुम ज्ञानरूप हो, किसी एक विशेषरूप का निश्चय न होने से सबमें अनुगत सत्तासामान…
  10. Verse 10प्रयोजन की अपेक्षा न चाहने से भी यह सृष्टि नहीं हैं, यह कहते है/ अज परमात्मा के नित्यानन्…
  11. Verse 11इस तरह तत्वद्रष्टि से नित्यमुक्ता की सिद्धि का उपफयादन करके इसका स्वीकार न करने पर मूर्खो…
  12. Verse 12अर्धप्रदुद्ध पुरुषों की इष्टि से जैकी संसार की स्थिति रहती है, उसे कहते हैं / जहाँ-जहाँ प…
  13. Verse 13तृण, काष्ठ, जल और दीवार में सर्वत्र ही परब्रह्म स्थित है तथा सभी जगहों में सृष्टि का समूह…
  14. Verse 14तव तो ऐसी दशामें ब्रह्म का निथ्यासर्गही स्वभाव काहिये, हानि क्या है इस आशंका पर नहीं यह क…
  15. Verse 15व्यावर्तक में स्व शब्द का अरस्नंघटन कहकर भाव शब्द का अर्रंघटन भी दिखलाते हैं / अभाव की अप…
  16. Verse 16व्यावर्त्य पदार्थ की प्रश्निद्धि न रहने से भी स्व“ और अभाव" इन दोनों पर्दो का सघटन नहीं क…
  17. Verse 17जिम्न तरह ब्रह्म में सृष्टि आदि की सिद्धि न होने से वह अद्रय प्रिद्ध होता है उछी तरह प्रत…
  18. Verse 18उपलब्ध होता है वह परब्रह्म ही है तथा अहन्ता के शब्दार्थो से युक्त जो उपलब्ध होता है वह शा…
  19. Verse 19इसर द्रष्टि से जैसे जाज्य वित्स्वभाव को ग्राप्त है वेंसे ही जीव और जयत्‌ का भेद भी अभेवस्…